जान जाने से बेपरवाह बेशर्म तालियाँ बजती रहीं
बाजारू सियासत की शर्मनाक महफिलें चलती रहीं !
वो पत्थर के पुतले थे अविचलित खड़े रहे मंच पर
दूर जिस ‘आदमी’ ने सुना उसकी आँखें बरसती रहीं !!
महज ‘वोट’ में बदल गया आमआदमी इस मुल्क में
मरने के बाद उसकी किस्मत में दो गज धरती रही !
शिवशंकर सी भोली जनता ने वोटों से भस्मासुर गढ़े
फिर हर बार उसे अपनी ये गलतियाँ अखरती रहीं !!
कभी सूखा, कभी ओले, कभी दंगों का दावानल
बेकसूरों की लाशें सत्ता के श्मशानों में जलती रहीं !!?!!
बाजारू सियासत की शर्मनाक महफिलें चलती रहीं !
वो पत्थर के पुतले थे अविचलित खड़े रहे मंच पर
दूर जिस ‘आदमी’ ने सुना उसकी आँखें बरसती रहीं !!
महज ‘वोट’ में बदल गया आमआदमी इस मुल्क में
मरने के बाद उसकी किस्मत में दो गज धरती रही !
शिवशंकर सी भोली जनता ने वोटों से भस्मासुर गढ़े
फिर हर बार उसे अपनी ये गलतियाँ अखरती रहीं !!
कभी सूखा, कभी ओले, कभी दंगों का दावानल
बेकसूरों की लाशें सत्ता के श्मशानों में जलती रहीं !!?!!

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