KUCHH BATE KUCHH YADE-जुगुप्सा न जगाओ मुझमें



स्त्री
पुरुष को और
पुरुष
स्त्री को सदैव
आकर्षित करते रहे हैं
अपने होने से परस्पर
हर्षित करते रहे हैं .....
पर
स्त्री होने के नाते मुझमें
यह बात नफरत जगाती है
अधिकांश
पुरुषों की आँखों में
सिर्फ एक चाह नजर आती हैं
जैसे
तुम्हें स्त्री की देह
सोते जागते हैरान करती है
वैसे
मुझे पुरुष की देह
वक्त बेवक्त परेशान करती है
मैं भी
देखती हूँ
पौरुष भरी बाँहों की मछलियाँ
अंदर धंसा पेट
बाहर निकला सीना और
यूनानी देवता सी पसलियाँ
पर
तुम्हें पता ही नहीं लगता है कि
कब मैंने दीदार कर लिया
चुपचाप
शालीनता से, सौम्यता से
भरपूर प्यार कर लिया ....
और
तुम्हारी नजरें
रेंगती हैं जहरीले सर्प की तरह
मुझमें
नहीं जागता है प्रेम
देह हो जाती है बर्फ की तरह
आँखों ही आँखों से
मुझे चीरकर
तुम मुझे जताते भी हो
क्या क्या
कितना कितना देखा
बेशर्मी से बताते भी हो....
जुगुप्सा
न जगाओ मुझमें तुम नर
अंतहीन असीम प्यार जगाओ
मैं हाँ मैं
स्वयं आ जाऊं बाहों में
तुम मुझमें ऐसा खुमार जगाओ ...!!?!!
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