MERI CHAND TERI KIRANE


मेरे चाँद तेरी किरणें अब मेरे घर नहीं आती रे

दीपक की बाती भी अब वैसी लौ नहीं उठाती रे

जाने कौन छीन ले गया उसके लबों की मिठास

आजकल कोयल भी तो कितना बेसुरा गाती रे

जाने कैसी होगी मरुस्थल में खोयी मेरी नदी

काश मेरी कांपती हथेली कोई चिठिया पाती रे

पत्थर का दिल है मेरा जल्दी नहीं पिघलता है

पर तेरी यादें, तेरी यादें इतना क्यों रुलाती रे

सारी आशंकाएं नर्मदा में बहकर आ जा

मेरी पलकें तेरी राहों में ढेरों गुलाब बिछाती रे !!?!!
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