आज से नहीं आदिकाल से कमेन्ट हो रहे हैं
सीता जैसी के चरित्र पर जजमेन्ट हो रहे हैं
मुझे कौन छोड़ेगा सड़क पर आते जाते हुए
आँखों से ही खा जायेगा सीटियाँ बजाते हुए
आज भी ‘लड़की’ दुनिया के लिए अजूबा है
एक जैसी हजार निगाहों का मुझे तजुर्बा है
कब तक ‘पिता’ या ‘भाई’ साथ जाते रहेंगे
‘लड़की’ को एक बोझ समझकर उठाते रहेंगे
मुझे भी कभी इंसा माना जाएगा क्या
36, 24, 36 से अलग पहचाना जाएगा क्या !!@!!
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