JO MAI LIKHTA HU PATA NHI KYA HOTA HAI..


मैं जो लिखता हूँ वो पता नहीं क्या होता है
लफ्जों में बस दिल का हाल बयां होता है
आदिकवि से आज तक लिखा जा चुका सब
मेरे जैसों के लिखे में फिर कहाँ नया होता है
जो लिखना चाहता हूँ वो नहीं लिख पाता हूँ
वास्तविक लिखा दो लफ्ज़ों के दरम्याँ होता है
मैंने देखा है उस दिन मुकम्मल होती है ग़ज़ल
जिस दिन दिल में कोई नश्तर गया होता है
मेरी तुकबंदियों की कीमत इतनी ही है
 हरेक लफ्ज के लिए बस आंसू बहा होता है !!?!!
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