MEETHI AAS MEIN BANDH LIYA SARA JAHAN


जाने क्या क्या जादू-मंतर कर मोहपाश में बाँध लिया

मैं तो था जोगी जन्म का मुझको रास में बाँध लिया

झुका के पलके की अमावस, लाई पूनम उठा के पलके

एक बैरागी को जादूगरनी ने ‘मीठी’ आस में बाँध लिया

चार वेदों के पोथे छूटे, सब पुराण हाथ से निकल गये

बाहों के बंधन सच्ची मुक्ति इस विश्वास में बाँध लिया

सारे जटाजूट कटवाकर बना दिया उसने मानव और

कभी न तृप्त होने वाली आदिम प्यास में बाँध लिया

हर तरफ सिर्फ और सिर्फ बहार नजर आती है

उसने बंजर जमीं को हरे-भरे अहसास में बाँध लिया !!?!! 
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