रूखे सूखे दहकते हुए जीवन में बहार बनकर आई थी
एक ‘मीठी’ सी लड़की मीठा सा प्यार बनकर आई थी
उस दौर में जब अँधेरा बनकर सबने द्वार बंद कर लिए
वो सूरजमुखी सा खिलता हुआ संसार बनकर आई थी
तुलसी के सूखते पौधे को उसने फिर से हरा कर दिया
वो अमृत, वो संजीवनी, वो ब्रह्म-अवतार बनकर आई थी
जब लगा कि कोई छिपा ले सीने में इस जमाने से
वह मुक्त गोरी बाजुओं से गले का हार बनकर आई थी
हर घाव को उसने भर दिया बस मीठी छुअन से
सलाम उसे दिल की गहराई से वो उपकार बनकर आई थी !!?!!
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