अभी तुम अनगढ़ हो, तुम्हें और संवार दूँ ठहरो -TUMHE DO DUNI CHAR DU...

तुम्हें दो दूनी चार दूँ


अभी तुम अनगढ़ हो, तुम्हें और संवार दूँ ठहरो

विद्यार्थियों! तुम्हें अपने बच्चे सा प्यार दूँ ठहरो

फिर गाऊंगा मंचों से अपने गीत, अपनी गज़लें

पहले अपने नमक का पूरा कर्ज उतार दूँ ठहरो

जब तुम बोलो-लिखो तो डिग्री न्यायसंगत लगे

माँ के दूध की तरह भाषा का संस्कार दूँ ठहरो

आधारशिला मजबूत हो तो अट्टालिका बनेगी

बड़े प्रमेय से पहले तुम्हें दो दूनी चार दूँ ठहरो

आदमी मिट्टी है मिट्टी में मिल जाएगा ‘मधु’

तुम अमर हो सको तुम्हें शाश्वत विचार दूँ ठहरो
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