तुझे गढ़ा था चन्दन से रब ने, ये बताती है खुश्बू
दशकों पुराने तेरे खतों से आज भी आती है खुश्बू
एक फूल ने आत्मकथा लिखकर खोला है ये राज
गुलाब की एक एक कली तुझसे ही पाती है खुश्बू
आज कुबूल किया अदालत में अपना जुर्म उसने
तू सो जाती है तो रातरानी तुझसे चुराती है खुश्बू
साथ तेरे रहकर मिलता है सुकून मंदिर में होने का
तेरी रूह से निकलकर मेरी रूह महकाती है खुश्बू
है तो तेरी, पर उसे मुझसे प्यार ज्यादा है
तू आजाद करे तो मुझसे लिपटकर गाती है खुश्बू !!?!!

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