रोटी के गर्म फुलकों में अब वो महक कहाँ रही माँ
तेरे मरने के बाद खूब खाने की सनक कहाँ रही माँ
तू थी तो तेरी गोद फिर फिर बना देती थी बच्चा मुझे
अब मेरे प्रौढ़ चेहरे पर बचपन की चमक कहाँ रही माँ
तेरे रहते रात देर से लौटने पर बहुत धड़कता था दिल
अब घर धर्मशाला बना, वो वाली धमक कहाँ रही माँ
पल्लू पकड़कर कहते सुनते थे परियों के हजारों किस्से
तेरा जाना बूढ़ा गया अब छुटपन की चहक कहाँ रही माँ
इन दिनों करता है बहुत ज्ञान-विज्ञान की बातें
तेरे साए में होने वाली वो मासूम बकबक कहाँ रही माँ !!?!!

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