ये आदत जाती नही -यह आखिरी वक्त की आदत जाती नहीं

पुरानी आदतें जाती नहीं हैं। दूसरा कोई रूप अख्तियार कर के सामने जाती हैं। जैसे कि ये बचपन की पुरानी कहानी। जो भी होगा, आखिरी घड़ी में ही होगा। जब तक जान आफत में जाए, क्या मजाल कि कोई काम पूरा हो जाए। 

होमवर्क के साथ भी यही रिश्ता था। स्कूल से घर आकर, खाना वगैरह खाकर पहले नीचे जाकर क्रिकेट खेलना और खेलते रहना जब तक कि शाम इतनी गहरी हो जाए कि बॉल नजर आनी बंद हो जाए। (हमारे क्रिकेट के मैदान में फ्लड लाइट की कोई व्यवस्था नहीं थी जो कि अच्छा ही था, नहीं थो पता नहीं क्रिकेट का खेल कैसे और कितने बजे खत्म होता?) फिर घर आकर मटरगश्ती, फिर थोड़ा टीवी, फिर थोड़ा उपन्यास, फिर खाना और जब मम्मी ने धमकी देना शुरू किया कि बस अब बत्ती बंद करके सो जाओ तो अचानक होमवर्क का ख्याल आता था और फटाफट उसे पूरा किया जाता था। रोज ऐसा हो, ऐसा नहीं, कभी-कभी तो अगले दिन सुबह उठकर भी एक हाथ से नाश्ता और दूसरे हाथ से होमवर्क। उससे भी दो कदम आगे वे विद्यार्थी जो कि चलती बस में होमवर्क पूरा करते थे और सबसे आगे वे जो कि क्लास में पहुंचकर लिखना शुरू करते थे। 

इम्तिहान का भी यही हाल था। पूरे साल आवारागर्दी और फिर मैं क्या करता था, परीक्षा से एक महीने पहले तैयारी शुरू करता था। अगर आप समझ रहे हैं कि एक महीना काफी होता है तो सुनिए मेरी तैयारी का सिलसिला। मैं एक कागज के पन्ने पर हिसाब लगाना शुरू करता था। आज से एग्जाम के लिए चार हफ्ते बचे हैं, यानी 28 दिन, बायोलॉजी के कुल पेज हैं 210, मतलब रोज तीन पेज बायोलॉजी के, दो चैप्टर गणित के, पांच पेज हिस्ट्री के, वगैरह-वगैरह। और इसी हिसाब-किताब में पता चला दो घंटे निकल गए। 
अगले दिन यह सारी इक्वेशन बदल जाती थी क्योंकि अब एक दिन कम है और पन्ने पढ़ने उतने ही हैं। फिर वापस हिसाब-किताब। यह सिलसिला ऐसे ही जारी रहता था और फिर आखिरी वक्त, अगले दिन इम्तिहान। सारी-सारी रात को जाग के पढ़ना, क्लास के बाहर खड़े होकर रिवीजन करना और फिर भगवान का नाम लेकर परीक्षा कक्ष में घुसना। और जैसे ही इम्तिहानों के बोझ से छुटकारा मिला, फिर वापस अगले साल तक यही क्रम दोबारा। 

और यही हाल सब जगह रहा है। कहीं फीस देनी हो तो आखिरी वक्त पर। टेलीफोन का बिल देना हो तो फोन लाइन कटने के बाद। घर का किराया देना हो तो मकान मालिक की धमकियों के बाद। सुबह उठना हो तो अलार्म को पांच दफा बंद करने के बाद। रोज स्कूल में पांच मिनट लेट, रोज ऑफिस में पंद्रह मिनट लेट। तब ट्रेन पकड़ते थे तो प्लेटफॉर्म पर भाग के, सामान लादे हुए, चलती गाड़ी में कूद के। अब फ्लाइट पकड़ते हैं तो जब तक लास्ट एंड फाइनल कॉल सुनाई नहीं देता, कॉफी ही पीते रहते हैं। अगर ट्रैफिक में फंसे हुए यह ख्याल नहीं आए 25 बार कि भाई आज तो फ्लाइट छूटी तो फिर फ्लाइट का आनंद ही क्या? 
जब तक डेडलाइन का डंडा हो सिर पर, कोई काम खत्म ही नहीं होता। अब इस कॉलम की ही बात लीजिए। जब तक तीन रिमाइंडर नहीं आते इस अखबार से, क्या मजाल कि मैं कम्प्यूटर पर बैठ के लिखना शुरू कर दूं। जैसा कि मैंने कहा, कुछ आदतें छूटती ही नहीं, क्या करें...। 
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