देखा बचपन सीधे बुढ़ापे में ढलते हुए

बुढ़ापे में ढलते हुए


जाने किस किस दर्द से गुजरते हुए

आदमी जीता है यहाँ रोज मरते हुए

बाहर महफूज है मगर मैंने देखा है !

आदमी को अपने घर में डरते हुए

बहाता है सैलाब आंसुओं का आदमी

औरों के गुनाहों का दण्ड भरते हुए

जिंदगी का कुल जमा खर्च बस ये है !!

खत्म औरों के इशारों पर चलते हुए

इन दिनों यौवन कहाँ मिलता है

देखा बचपन सीधे बुढ़ापे में ढलते हुए !!?!!
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