आदमी की औकात अदनी है काल के सामने
सब धरा रह जाता है एक भूचाल के सामने
दिल बैचेन है दिमाग के इस सरल प्रश्न पर
कैसे लोग मरे काठमांडू में महाकाल के सामने
कितना ही ‘शकुनिपन’ समा जाए इंसा में
हारता है हर बाजी खुदा की चाल के सामने
बस बेबस होकर रह जाता है चाँद का विजेता
उपर वाले तेरे न दिखने वाले जाल के सामने
क्यों देता है तबाही बारिश से जलजले से
वैसे ही भूख का सवाल है तेरे लाल के सामने !!?!!

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