मीठी, मीठी, मीठी, मीठी, बहुत मीठी बातें करती थी
जाने कहाँ गयी वो लड़की जो जीवन में रंग भरती थी
जितनी प्रीत की उसने, उतनी प्रीत क्या करेगा कोई
मेरे लिए ही जीती थी वो और मेरे लिए ही मरती थी
हो जाती थी वो उदास मेरी आँखों का सन्नाटा देखकर
मेरे होठों पर मुस्कान देख वो कितना मीठा हंसती थी
जीवन के केनवास पर स्वतः चलने लगती थी तूलिका
मेरे चित्रकार मन के लिए वो बेहद सजती-संवरती थी
कोई कोई ही शहद और मिश्री सा मीठा होता है
‘वो’ दुनिया की हर मिठास से ज्यादा ‘मीठी’ लगती थी !!?!!
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