"अनोखा उपहार"मेरे दोस्त को मेरी ओर से




आज निकल पड़ी मैं अपना झोला लेकर, इस उम्मीद में ,तुझे खुश कर पाऊँगी |
कि समा भी न पायें मेरे इस झोले में, ऐसे ढेरों तोहफों की मैं कतार सजाऊँगी |
जब पहुँच गयी थी बाज़ार में,यहाँ की चकाचोंध मुझे लुभाने लगी |
सुन ! तेरे दोस्त को मैं बहुत पसंद आउंगी, ऐसा कहकर हर चीज़ मुझे मानाने लगी |
हाथ में पैसे भी थे.... सोचा ,आज दिल की ख्वाइश को मोका दिया जाये |
जन्मदिन के इस शानदार मोके पर, क्यों न मेरे दोस्त को चोंका दिया जाये |
फिर क्या जो भी समझ आ रहा था मुझे ,वो झोले में भरती जा रही थी |
इन्हें पाकर तेरी ख़ुशी का स्तर क्या होगा , ऐसा ख्यालों में ही बुनती जा रही थी ।
अब कुछ ही पैसे बचे थे और लगा ,झोले में अभी कुछ अधूरा था |
फिर एक बेकरी शॉप देखकर केक याद आया, बिना जिसके जन्मदिन कहाँ पूरा था ।
वहां बाहर एक बच्ची खड़ी जिद पर अड़ी थी, कि माँ मुझे आज ये केक चाहिए |
और माँ इस सोच में थी कैसे समझाऊ इसे , कि खरीदने के लिए पैसे भरी जेब चाहिये ।
वो बोली घर चल ,हर बार की तरह हाथों से आज कुछ अच्छा बनाउंगी |
बच्ची गुस्से में थी बोली , नहीं आज केक नहीं मिला तो अपना जन्मदिन नहीं मनाऊँगी |
हाथ में केक था ...सोचा आज दिल को चोंका दिया जाये |
हर बार तो मेरा दोस्त केक कटता ही है, क्यों न इस बार नन्हे हाथों को मोका दिया जाये |
बस फिर....
निकल पड़ी मैं अपनी मंजिल को
समझाते हुए इस मायूस दिल को,
ए मेरे दिल, क्या तू इतना तुच्छ है
अभी भी इस झोले में बहुत कुछ है।।
उधर फूटपाथ पर एक बच्चों का झुण्ड मायूस खड़ा था ,
वो चॉक्लेट के पोस्टर को देख जो उस दूकान पर लगा था |
फिर बड़ी मासूमियत से खुदा के सामने वो सवाल उठाते है ,
हे भगवान क्या ये सब सिर्फ घरों में रहने वाले ही खा पाते है |
झोले में ढेरों चॉक्लेट थी ...सोचा , आज दिल को चोंका दिया जाये
शायद हर हफ्ते ही मेरा दोस्त इसे खरीद सकता है, क्यों न इस बार इन बच्चों को मोका दिया जाये ।
बस फिर....
निकल पड़ी मैं अपनी मंजिल को ,
समझाते हुए इस मायूस दिल को |
ए मेरे दिल, क्या तू इतना तुच्छ है ,
अभी भी इस झोले में बहुत कुछ है |
जनवरी का महीना और वो बूढ़ा आदमी, ये सर्दी का मौसम उसे तड़पा रहा था
क्या पहना था उसने शायद एक पेंट एक सूती कमीज
और कपड़ा भी हर तरफ से उधडा जा रहा था
झोले में एक जैकेट था ...सोचा, आज दिल को चोंका दिया जाये
मेरे दोस्त के पास तो ऐसे कई कपडे होंगे
क्यों न इस बार इस आदमी को मोका दिया जाये
बस फिर....
निकल पड़ी मैं अपनी मंजिल को,
समझाते हुए इस मायूस दिल को |
ए मेरे दिल, क्या तू इतना तुच्छ है,
अभी भी इस झोले में बहुत कुछ है |
फिर राह में ऐसे कई मिले कोई भूखा तो कोई बेसहारा ,
जानती नहीं कि वो मुझे सुना रहे है या मैं सुन रही हु उनका दुखियारा |
झोले में बहुत कुछ था... सोचा, आज दिल की ख्वाइश को रोक दिया जाये
मेरे दोस्त को शायद इन सबकी जरुरत ही नहीं
क्यों न इस बार सब जरूरतमंद को सौंप दिया जाये |
आ चुकी थी मैं अपनी मंजिल को,
चोंक गयी देखकर अपने इस दिल को |
ए दिल, क्या हुआ तू बिल्कुल दुःखी नहीं,
अब तो इस झोले में देने को कुछ भी नहीं |
दिल बोला झाँक के देख अपने आशियाने में, तू कितना कुछ तो लायी है |
कि समां भी नहीं पा रही तेरे छोटे से झोले में, अतुल्य् है सब तू जो भी लायी है |
बच्चों को फिर से हँसता देख तुझे हँसी मिली,
उस छोटी बच्ची को खुश करके तू साथ खुशियाँ लायी है |
बूढे आदमी को सुकून देकर तुझे भी तो सुकून मिला,
उस भूखे गरीब की भी तो तू ढेरों दुआएं लायी है |
और कहती है तू बाजार से खाली हाथ आई है ।
ए खुदा तुझसे एक गुजारिश है, बस तू इनकार मत कर देना |
आज जो भी कहती जाऊ मेरी ओर से, मेरे दोस्त को तू उपहार कर देना |
मुझे मिली खुशी उसे दिला दे , मेरी हँसी से उसका चेहरा खिला दे ,
सारा सुकून उसे दे चाहे तो मुझे तकलीफ देना ,
यहाँ तक की मुझे मिलने वाली दुआएं भी उसके हिस्से में लिख देना ||




 -(निष्ठा वार्ष्णेय )
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