निकाल दो कुर्सियां-

लफ्ज बेंगन सा न तस्तरी में बैठेगा

वही कहेंगे जो खरी -खरी में बैठेगा


न चाँद, न फूल, न इश्क, न आशिक

जहाँ का दुःख -दर्द शायरी में बैठेगा

इस मजलिस से निकाल दो कुर्सियां

आदमी आदमी की बराबरी में बैठेगा

चंद लोगों के रहमोकरम पे है मुल्क

अब न ये शायर मसखरी में बैठेगा

उजाले के ठेकदार नहीं माने तो

सूरज से लड़ने को दोपहरी में बैठेगा !!?!!
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