कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी मौतों से वोट खेंचेंगे
मृत शहीदों के ताबूतों से कमीशनखोरी के नोट खेंचेंगे !
हमारे खूनी हाथों में है गर्दन मुल्क के संविधान की
अपनी कमीनी फितरत में जमाने भर की खोट खेंचेंगे !!
जिन्हें पतवार सौंपी है वो बस डुबाना ही जानते हैं
जिस तरफ भंवर ज्यादा होंगे उधर ही बोट खेंचेंगे
उन्हें क्यों न यकीन हो भला हर बाजी जीत जाने का !!
सत्ता के शकुनी शतरंज के लिए नकली गोट खेंचेंगे
एक ही हमाम में जा रहे हैं सारे ‘जिम्मेदार’
अब तुम सब देखना ये एक दूसरे की लंगोट खेंचेंगे !!?!!

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