एक जिन्दगी लाश में बदली, पर स्वर नहीं बदले



एक जिन्दगी लाश में बदली, पर स्वर नहीं बदले

सियासती मोहरे वैसे ही चले उनके घर नहीं बदले

दिमाग में दर्ज थे राजनीतिक रोटी सेंकने के नुक्से

संवेदना नहीं पैदा हुई भाषण के अक्षर नहीं बदले !!

सुना है मुल्क आजाद हो गया सैंतालीस में मगर

सत्ता चलाने वाले सांप, बिच्छू, अजगर नहीं बदले

मुर्दे पर ओढ़ाए गये कफन के साथ लाखों के चेक

अंग्रेजों की राजशाही गयी मगर मंजर नहीं बदले !!

जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा

परिभाषा अच्छी है पर शासक के कहर नहीं बदले !!?!!
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