टी.वी. पर बहस करते प्रवक्ताओं से डर लगता है
सरेआम मरता हुआ किसान उन्हें खबर लगता है
कांव कांव कांव के सिवा कुछ सुनाई नहीं देता
टी.वी. का परदा पागल कौव्वों का घर लगता है
जब वो कहते हैं हम जनसेवक हैं सेवा करेंगे
झूठ से भरा उनका हरेक कथन जहर लगता है
आजादी के बाद इतना तो पढ़-लिख गयी जनता
रोने पर राजनेता सजा-धजा मगर लगता है
दशकों के लोकतंत्र का निष्कर्ष यही तो है
जिसे देखो वो बेवकूफ बनाने को तत्पर लगता है !!?!!
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