गले में मंगलसूत्र और पैरों में बिछियाएँ हैं
औरत के हिस्से में कितनी हथकड़ियाँएँ हैं
उठ कहा उठ गयी, बैठ कहा तो बैठ गयी
इंसा कहाँ हैं नारी तो बस कठपुतलियाँएँ हैं
माथे से एड़ी तक रंगरोगन कजरे मेहंदी का
नारी धरती के शोकेश में सजी गुड़ियाएँ हैं
तानों, उलाहनों का मानसून देता है नमी
इस जमीं पर नारी अश्रु भरी बदलियाँएँ हैं
ये ही हाल रहा तो कैसे जी सकेंगी
स्त्री के लिए हर कदम पे जबरदस्तियाँएँ हैं !!?!!

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