हर झुर्री अपने में एक कथानक बसाये हुए है
पिता के चेहरे में कई महाकाव्य समाये हुए है
अब तलक बेरोजगार हैं पढ़े - लिखे बेटे सभी
बेबस बूढ़ा बाप संविधान को गले लगाये हुए है
अब न टीवी देखते हैं न अखबार पढ़ते हैं पापा
आत्मघात करते युवाओं की खबरें डराये हुए है
सरकारें बदली मगर हालात जस के तस रहे
सब एक जैसे निकले हैं सभी आजमाये हुए है
हादसा नहीं थी, पिता की वह दुर्घटना
बदले में एक बेटा अनुकम्पा नौकरी पाये हुए है !!?!!

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