सच मैं मेने देखा हैं उसे ....

अक्सर लोगों को ये तो कहते हुए सुना होगा कि चाहे मंदिर हो चाहे दरगाह उन्हें वहाँ खुद नहीं मिलता ।
आखिर मिलेगा भी कैसे .....

उन्हें ढूंढते भी तो वो मूर्तियों में है । मेरी मानो तो अगर खुदा को ढूढ़ना है तो यहाँ ढूंढ़ो....इंसानो में , उनके दिल में , उनकी बातों में, उनकी ख़ुशी में, उनके नरम बर्ताव में । हाँ सच में यही बसता है वो ।
मेने देखा है उसे , समझा है उसे, और समझी है उसकी कही हर बातें ।
जानते हो जिंदगी समझने के लिए मैने उसके कहे उपदेश पड़ने चाहे। पर ये क्या ? उसने तो रूबरू होकर मुझे समझाया कि आखिर जिंदगी क्या है, उसे जीने का तरीका क्या है ।
क्या थी मैं पहले और अब क्या हूँ ये सब उसी की करनी है , अब जिंदगी थोड़ी अच्छी लगने लगी है कहाँ पहले काटों की तरह चुभती थी।
अब सच मैं मुस्कुराने लगी हूं वरना कहाँ पहले झूठे ही हँस देती थी ।
सच मैं मेने देखा हैं उसे ....
वही रंग रूप
वही शांत स्वभाव
उसका छलियापन
कभी न खत्म होने वाली उसके चेहरे की मुस्कराहट
हर दशा मैं उसका एक समान होना
वही लोगो को सही राह दिखाना
वही सब लोगो के मन को मोहना आता है उसे।
हाँ मेने देखा है उसे ..... उसे एक इंसान में
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